ईरान और अमरीका की 'लड़ाई' में पिस जाएगी सारी दुनिया?
ऐसा लग रहा है जैसे अमरीका और ईरान के बिगड़ते सम्बंधों की जद में आकर दुनिया के कई देशों के लोगों का जीना मुहाल होने वाला है.
एक तरफ़ जहां अमरीका अपने सहयोगी देशों को ईरान से तेल न खरीदने पर मजबूर करके ईरान की अर्थव्यवस्था को धराशायी करना चाहता है वहीं ईरान का कहना है कि वो किसी भी हालत में झुकने वाला नहीं है.
अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने अभी भी ईरान से तेल ख़रीद रहे देशों के लिए प्रतिबंधों से रियायतें ख़त्म करने का फ़ैसला लिया है.
व्हाइट हाउस का कहना है कि चीन, भारत, जापान, दक्षिण कोरिया और तुर्की को दी गई छूट 2 मई को ख़त्म हो जाएगी.
इसके बाद इन देशों पर भी अमरीका के प्रतिबंध लागू हो जाएंगे. अमरीका ने ये फ़ैसला ईरान के तेल निर्यात को शून्य पर लाने के उद्देश्य से किया है. इसका मक़सद ईरान की सरकार के आय के मुख्य स्रोत को समाप्त करना है.
इतना ही नहीं, अमरीका ने ईरान के एलीट रिवोल्यूशनरी गार्ड को 'विदेशी आतंकवादी संगठन' क़रार दिया था.
अमरीका पिछले साल ईरान समेत छह देशों के बीच हुई परमाणु संधि से बाहर हो गया था.
राष्ट्रपति ट्रंप के इस समझौते को रद्द करने के पीछे ये वजह बताई जा रही थी कि वो साल 2015 में तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा के समय ईरान से हुई संधि से ख़ुश नहीं थे.
इसके साथ ही अमरीका ने यमन और सीरिया युद्ध में ईरान की भूमिका की आलोचना भी की थी.
ट्रंप प्रशासन को उम्मीद है कि वो ईरान सरकार को नया समझौता करने के लिए मजबूर कर लेंगे और इसके दायरे में सिर्फ़ ईरान का परमाणु कार्यक्रम ही नहीं बल्कि बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम भी होगा.
अमरीका का ये भी कहना है कि इससे मध्य पूर्व में ईरान का "अशिष्ट व्यवहार" भी नियंत्रित होगा.
ईरानी मीडिया के मुताबिक़, अमरीका के ऐलान के जवाब में ईरान के विदेश मंत्री मोहम्मद जवाद ज़रीफ़ ने कहा है कि उनके पास अमरीकी प्रतिबन्धों का जवाब देने के लिए कई विकल्प हैं.
जवाद जरीफ़ ने कहा कि ईरान कई विकल्पों पर विचार कर रहा है और इनमें 'परमाणु अप्रसार संधि' से अलग होना भी शामिल है. उन्होंने कहा कि अगर ईरान को उसका तेल बेचने से रोका गया तो इसके गंभीर परिणाम होंगे.
इस बीच ईरान के शीर्ष जनरल ने चेतावनी दी है कि अगर ईरान 'और ज़्यादा विद्वेष का सामना करना पड़े तो वह सामरिक रूप से महत्वपूर्ण होरमुज जलसंधि मार्ग को बंद कर सकता है.
उन्होंने कहा, "अगर हमारे तेल के जहाज जलसंधि से नहीं जाएंगे तो निश्चित तौर पर बाकी देशों के तेल के जहाज भी जलसंधि को पार नहीं कर पाएंगे."
अमरीकी प्रतिबंधों का ईरान की अर्थव्यवस्था पर व्यापक असर हुआ है. ईरान की मुद्रा इस समय रिकॉर्ड निचले स्तर पर है.
सालाना महंगई दर चार गुना तक बढ़ गई है, विदेशी निवेशक जा रहे हैं और परेशान लोगों ने सरकार के ख़िलाफ़ प्रदर्शन तक किए हैं.
इसके अलावा ईरान और अमरीका में बढ़ते तनाव के बीच दुनिया के कई हिस्सों में तेल की आपूर्ति बाधित होने का ख़तरा मंडरा रहा है. हालांकि अमरीका वैश्विक बाज़ार और ग्राहकों को यह आश्वासन देने की कोशिश कर रहा है कि दुनिया में इतनी जल्दी तेल की सप्लाई पर असर नहीं पड़ेगा.
अमरीकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने कहा है कि उसके दो सहयोगी देश सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात से तेल की आपूर्ति बढ़ाकर ईरान की जगह भरेंगे.
हालांकि इस बीच दो प्रमुख तेल उत्पादक देशों की स्थिति पहले से ही खराब है. वेनेज़ुएला पर भी अमरीका ने पाबंदियां लगाई हुई हैं और लीबिया में पिछले कुछ हफ़्तों में हिंसक माहौल बना हुआ है.
अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार एलेक्ज़ेंडर बूथ का मानना है कि सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात मिलकर भी ईरान की जगह नहीं भर पाएंगे. एलेंक्जेंडर कहते हैं कि हालात संभालने के लिए रूस को भी अपना उत्पादन बढ़ाना होगा.
इसके अलावा एक ख़तरा और है. अगर तेल उत्पादक किसी और देश (उदाहरण के लिए नाइजीरिया) में हिंसा या संकट की स्थिति पैदा हो जाए तो तेल कंपनियों के लिए हालात बेहद मुश्किल हो जाएंगे.
यानी इसका मतलब साफ़ है कि आने वाले दिनों में दुनिया के तमाम देशों में भी हालात मुश्किल होने वाले हैं. अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में तेल की क़ीमत बढ़ेगी और नतीजन महंगाई भी बढ़ेगा. आख़िरकार, इसका असर कहीं न कहीं कई देशों की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा.
भारत में आम चुनाव चल रहे हैं और ऐसे में अतंरराष्ट्रीय स्तर पर हो रहे इन बदलावों को बेहद अहम माना जा रहा है.
ईरान से सबसे ज़्यादा तेल ख़रीदने वालों में चीन के बाद भारत दूसरे नंबर पर है. अमरीका की इस पाबंदी का भारत के बाज़ार पर क्या असर होगा, इसे लेकर चिंताएं जताई जा रही हैं.
भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा है, "सरकार ने अमरीकी सरकार के इस फ़ैसले को देखा है. हम इस फ़ैसले के असर से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार हैं. पेट्रोलियम मंत्रालय इस बारे में पहले ही एक बयान जारी कर चुका है. सरकार अपने ऊर्जा और आर्थिक सुरक्षा से जुड़े हितों की रक्षा के लिए अमरीका समेत अपने सहयोगी देशों के साथ काम करती रहेगी."
पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने भी ट्विटर पर लिखा है कि सरकार भारतीय रिफ़ाइनरीज़ को कच्चे तेल की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए अपनी योजना के साथ तैयार है. साथ ही दूसरे तेल उत्पादक देशों से भी बड़े स्तर पर आपूर्ति की जाएगी ताकि पेट्रोलियम पदार्थों की मांग को पूरा किया जा सके.
अमरीकी विदेश मंत्रालय की बीबीसी संवाददाता बारबरा प्लेट यूशर के मुताबिक, बीते कुछ हफ़्तों में जापान और दक्षिण कोरिया ने ईरान से तेल आयात को या तो रोक दिया है, या बिल्कुल कम कर दिया है. लेकिन अमरीकी सरकार के ताज़ा फ़ैसले का असर देशों के संबंधों पर पड़ सकता.
बारबरा के मुताबिक, "भारत के लिए तो यह और भी बड़ी समस्या है क्योंकि अमरीका उस पर वेनेज़ुएला से भी अपना तेल आयात घटाने का दबाव बना रहा है. लेकिन भारत के ईरान से गहरे सांस्कृतिक-राजनीतिक रिश्ते हैं इसलिए उसके लिए ईरान को घेरने की अमरीकी मुहिम में शामिल होना मुश्किल होगा. "
एक तरफ़ जहां अमरीका अपने सहयोगी देशों को ईरान से तेल न खरीदने पर मजबूर करके ईरान की अर्थव्यवस्था को धराशायी करना चाहता है वहीं ईरान का कहना है कि वो किसी भी हालत में झुकने वाला नहीं है.
अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने अभी भी ईरान से तेल ख़रीद रहे देशों के लिए प्रतिबंधों से रियायतें ख़त्म करने का फ़ैसला लिया है.
व्हाइट हाउस का कहना है कि चीन, भारत, जापान, दक्षिण कोरिया और तुर्की को दी गई छूट 2 मई को ख़त्म हो जाएगी.
इसके बाद इन देशों पर भी अमरीका के प्रतिबंध लागू हो जाएंगे. अमरीका ने ये फ़ैसला ईरान के तेल निर्यात को शून्य पर लाने के उद्देश्य से किया है. इसका मक़सद ईरान की सरकार के आय के मुख्य स्रोत को समाप्त करना है.
इतना ही नहीं, अमरीका ने ईरान के एलीट रिवोल्यूशनरी गार्ड को 'विदेशी आतंकवादी संगठन' क़रार दिया था.
अमरीका पिछले साल ईरान समेत छह देशों के बीच हुई परमाणु संधि से बाहर हो गया था.
राष्ट्रपति ट्रंप के इस समझौते को रद्द करने के पीछे ये वजह बताई जा रही थी कि वो साल 2015 में तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा के समय ईरान से हुई संधि से ख़ुश नहीं थे.
इसके साथ ही अमरीका ने यमन और सीरिया युद्ध में ईरान की भूमिका की आलोचना भी की थी.
ट्रंप प्रशासन को उम्मीद है कि वो ईरान सरकार को नया समझौता करने के लिए मजबूर कर लेंगे और इसके दायरे में सिर्फ़ ईरान का परमाणु कार्यक्रम ही नहीं बल्कि बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम भी होगा.
अमरीका का ये भी कहना है कि इससे मध्य पूर्व में ईरान का "अशिष्ट व्यवहार" भी नियंत्रित होगा.
ईरानी मीडिया के मुताबिक़, अमरीका के ऐलान के जवाब में ईरान के विदेश मंत्री मोहम्मद जवाद ज़रीफ़ ने कहा है कि उनके पास अमरीकी प्रतिबन्धों का जवाब देने के लिए कई विकल्प हैं.
जवाद जरीफ़ ने कहा कि ईरान कई विकल्पों पर विचार कर रहा है और इनमें 'परमाणु अप्रसार संधि' से अलग होना भी शामिल है. उन्होंने कहा कि अगर ईरान को उसका तेल बेचने से रोका गया तो इसके गंभीर परिणाम होंगे.
इस बीच ईरान के शीर्ष जनरल ने चेतावनी दी है कि अगर ईरान 'और ज़्यादा विद्वेष का सामना करना पड़े तो वह सामरिक रूप से महत्वपूर्ण होरमुज जलसंधि मार्ग को बंद कर सकता है.
उन्होंने कहा, "अगर हमारे तेल के जहाज जलसंधि से नहीं जाएंगे तो निश्चित तौर पर बाकी देशों के तेल के जहाज भी जलसंधि को पार नहीं कर पाएंगे."
अमरीकी प्रतिबंधों का ईरान की अर्थव्यवस्था पर व्यापक असर हुआ है. ईरान की मुद्रा इस समय रिकॉर्ड निचले स्तर पर है.
सालाना महंगई दर चार गुना तक बढ़ गई है, विदेशी निवेशक जा रहे हैं और परेशान लोगों ने सरकार के ख़िलाफ़ प्रदर्शन तक किए हैं.
इसके अलावा ईरान और अमरीका में बढ़ते तनाव के बीच दुनिया के कई हिस्सों में तेल की आपूर्ति बाधित होने का ख़तरा मंडरा रहा है. हालांकि अमरीका वैश्विक बाज़ार और ग्राहकों को यह आश्वासन देने की कोशिश कर रहा है कि दुनिया में इतनी जल्दी तेल की सप्लाई पर असर नहीं पड़ेगा.
अमरीकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने कहा है कि उसके दो सहयोगी देश सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात से तेल की आपूर्ति बढ़ाकर ईरान की जगह भरेंगे.
हालांकि इस बीच दो प्रमुख तेल उत्पादक देशों की स्थिति पहले से ही खराब है. वेनेज़ुएला पर भी अमरीका ने पाबंदियां लगाई हुई हैं और लीबिया में पिछले कुछ हफ़्तों में हिंसक माहौल बना हुआ है.
अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार एलेक्ज़ेंडर बूथ का मानना है कि सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात मिलकर भी ईरान की जगह नहीं भर पाएंगे. एलेंक्जेंडर कहते हैं कि हालात संभालने के लिए रूस को भी अपना उत्पादन बढ़ाना होगा.
इसके अलावा एक ख़तरा और है. अगर तेल उत्पादक किसी और देश (उदाहरण के लिए नाइजीरिया) में हिंसा या संकट की स्थिति पैदा हो जाए तो तेल कंपनियों के लिए हालात बेहद मुश्किल हो जाएंगे.
यानी इसका मतलब साफ़ है कि आने वाले दिनों में दुनिया के तमाम देशों में भी हालात मुश्किल होने वाले हैं. अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में तेल की क़ीमत बढ़ेगी और नतीजन महंगाई भी बढ़ेगा. आख़िरकार, इसका असर कहीं न कहीं कई देशों की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा.
भारत में आम चुनाव चल रहे हैं और ऐसे में अतंरराष्ट्रीय स्तर पर हो रहे इन बदलावों को बेहद अहम माना जा रहा है.
ईरान से सबसे ज़्यादा तेल ख़रीदने वालों में चीन के बाद भारत दूसरे नंबर पर है. अमरीका की इस पाबंदी का भारत के बाज़ार पर क्या असर होगा, इसे लेकर चिंताएं जताई जा रही हैं.
भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा है, "सरकार ने अमरीकी सरकार के इस फ़ैसले को देखा है. हम इस फ़ैसले के असर से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार हैं. पेट्रोलियम मंत्रालय इस बारे में पहले ही एक बयान जारी कर चुका है. सरकार अपने ऊर्जा और आर्थिक सुरक्षा से जुड़े हितों की रक्षा के लिए अमरीका समेत अपने सहयोगी देशों के साथ काम करती रहेगी."
पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने भी ट्विटर पर लिखा है कि सरकार भारतीय रिफ़ाइनरीज़ को कच्चे तेल की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए अपनी योजना के साथ तैयार है. साथ ही दूसरे तेल उत्पादक देशों से भी बड़े स्तर पर आपूर्ति की जाएगी ताकि पेट्रोलियम पदार्थों की मांग को पूरा किया जा सके.
अमरीकी विदेश मंत्रालय की बीबीसी संवाददाता बारबरा प्लेट यूशर के मुताबिक, बीते कुछ हफ़्तों में जापान और दक्षिण कोरिया ने ईरान से तेल आयात को या तो रोक दिया है, या बिल्कुल कम कर दिया है. लेकिन अमरीकी सरकार के ताज़ा फ़ैसले का असर देशों के संबंधों पर पड़ सकता.
बारबरा के मुताबिक, "भारत के लिए तो यह और भी बड़ी समस्या है क्योंकि अमरीका उस पर वेनेज़ुएला से भी अपना तेल आयात घटाने का दबाव बना रहा है. लेकिन भारत के ईरान से गहरे सांस्कृतिक-राजनीतिक रिश्ते हैं इसलिए उसके लिए ईरान को घेरने की अमरीकी मुहिम में शामिल होना मुश्किल होगा. "
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